रीठा के अयोधोगिक महत्व

रीठा सेपिनडेसी परिवार का सेपिनडेल्स गण तथा सिपिंडस कुल से एक मध्यम आकृति का आकर्षक एवं उपयोगी वृक्ष प्रजाति है। सेपिनडस कुल के फल को आमतौर पर भारतीय सोपबेरी या वॉशनट के रूप में जाना जाता है| विभिन्न प्रान्तों और भाषाओ में रीठा को विभिन्न नामों से जाना जाता है| आँग्लभाषा में इसे सोपनट-ट्री, संस्कृत में फेनिला व ऊरिष्ठा, हिंदी मे रीठा, गुजराती मे अरीठा, ओडिया मे ईटाई, तमिल मे पोनम-कोत्ताई, तेलगु मे कुनकुडू, कन्नड़ मे अन्तोवाल्कई गेडा, हिमाचल में डोडा एवं कुट्टू, तथा पूर्वोत्तर राज्यों में यह एम्-सेलेंग वहेतागुडी इत्यादि नाम से जाना जाता है| सामान्यतः रीठा को उसके फल से डिटर्जेंटयुक्त गुण वाले ‘सैपोनिन’ नामक अवयव होने के कारण जाना जाता है| चूँकि, यह स्वाद मै कड़वा होता है अतः रीठा के फल का उपयोग खाने के रूप मै नही किया जाता है| यद्यपि, मुख्यतः रीठा की उपयोगिता इसके फल से ही जानी जाती है, पर न सिर्फ फल, अपितु पूरे वृक्ष की विशिष्ट
उपयोगिता है| चौड़ी पत्ती वाला वृक्ष होने के कारण, यह वृक्ष जल संरक्षण एवं मृदा अपरदन को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है| सामान्यतः रीठा मानव जनजीवन के आसपास पाया जाता है| प्राचीन काल से ही लोग रीठा को अपने उद्यानों में उगाते और उपयोग करते आये हैं| विशेषज्ञों के अनुसार विश्वभर में रीठा की लगभग ४० प्रजातियां पायी जाती हैं| सम्पूर्ण भारत मे रीठा की सिर्फ ३ प्रजातियां; सेपीन्डस मुक्कोरोस्सी, सेपीन्डस इमार्जीनेटस
और सेपीन्डस ट्राईफोलीएटस ही पाई जाती है| सेपीन्डस मुक्कोरोस्सी उत्तर भारत और पूर्वोत्तर राज्यों का वृक्ष है| तीनो प्रजातियों में मुकोरोस्सी का फल अधिक बड़ा होने के कारण इस प्रजाति की उपयोगिता आधिक मानी जाती है| इसके अतिरिक्त पूर्वोत्तर राज्यों अरुणाचल प्रदेश , असम और मेघालय प्रान्तों मे भी बहुतायत मै पाया जाता है|रीठा से निर्मित उत्पाद आजकल बाजार मे रीठा से निर्मित उत्पादों की मांग है जिसमे क्रमश: शैम्पू , रीठा पाउडर, हैण्ड सैनीटाईजर,रीठा सीडस, रीठा हेयर केयर उत्पाद इत्यादी प्रमुख है|
धार्मिक मान्यताये
पौराणिक मान्यताये के अनुसार उत्तराखंड के चम्पावत जिले मे स्थित रीठा-साहिब गुरुद्वारारीठा के मीठे गुण को लेकर विश्वविख्यात है इसलिए गुरुद्वारा रीठासाहिब के नाम से जानाजाता है| चम्पावत जिला मुख्यालय से लगभग ७२ किलोमीटर की दुरी मे स्थित लोधिया औररतिया नदी के मध्य डुएरी नामक गाव मै स्थित यह गुरुद्वारा, रीठा के मीठे गुण के कारणविख्यात है| कहा जाता है कि सिखों के धर्मगुरु नानक देव कैलाश यात्रा के दौरान यहाँ रुके
थे और अपने शिष्य मरदाना को भूख से व्याकुल देखकर उन्होंने वहा स्थित रीठा के वृक्ष को छुआ और उनकी दिव्य द्रष्टि के प्रभाव से रीठा के फल मीठे हो गये, और मरदाना ने रीठा के फल खाकर अपनी भूख शांत किया| तब ही से यहाँ उगे रीठा के वृक्ष के फल मीठे होते है|
यहाँ स्थपित गुरूद्वारे में गूरुपुर्निमा के दिन मेला लगता है| सारे देश से श्रदालु गण यहाँ आते है| इस गुरूद्वारा में मीठा रीठा प्रसाद के रूप मै वितरित किया जाता है रीठा के फल के इस मीठे गुण का कारण पता करने पर बिभिन्न संस्थानों मै शोध कार्य हो रहे है |
वैज्ञानिक तथ्य एवं प्रयोग
सोप नट शिशु की त्वचा के लिए पर्याप्त कोमल होते हैं और डायपर को धोने और गंध को हटाने के लिए प्रभावी होते हैं। हालांकि साबुन नट्स को बालों और स्कैल्प को स्वास्थ्य बनानेके लिए जाना जाता है, यह प्राकृतिक रूप से एंटी फंगल और एंटी माइक्रोबियल होते हैं। सैपोनिन एक अत्यंत प्रभावी और सुरक्षित और रासायनरहित कीटनाशक और कीट विकर्षक
है।रीठा के वृक्ष की मुख्य विशेषता यह है की यह वृक्ष सभी प्रकार की मिटटी मै उगाया जा सकता है प्रजनन सामान्यतः बीजो द्वारा होता है, लेकिन वर्तमान समय में ग्राफ्टिंग एवं बडिंग द्वारा भी इस वृक्ष को हम अत्याधुनिक पादप ऊतक संवर्धन विधि से उगे वृक्ष जल्दी ही फल देने लगते है| सामान्यतः, प्राकृतिक बिधि से बीजो द्वारा प्रजनन में बीजो को बोने से पहले भिगो देते है| इस बिधि से पौधा सामान्यतः २ से ३ सप्ताह में तैयार हो जाता है| वर्तमान समय में सभी लोग स्वास्थ्य के प्रति पहले से अधिक जागरूक हैं| कृतिम रसायनों से बने उत्पादों के हानिकारक प्रभावों के कारण लोगो का रुझान हर्बल उत्पादों की ओर बढ रहा है| रीठा द्वारा निर्मित सभी उत्पाद हानिकारक प्रभावों से मुक्त है, इसलिए अब बाज़ार में रीठा से निर्मित वस्तुए सिर्फ छोटी कंपनियो या लघु उद्योगों तक ही सीमित नहीं है|प्राकतिक पदार्थो से बने उत्पादों की बढती लोकप्रियता एवं मांग को देखकर बहुराष्ट्रीय कंपनिया भी हर्बल पदार्थो का निर्माण कर रही हैं|
आदिकाल से ही ऋषि-मुनि एवं वैद्य द्वारा रीठा के फल का उपयोग मुख्यत: बाल , कपडे और आभूषण साफ़ करने में किया जा रहा है| रीठा का उपयोग माइग्रेन, तीव्र सरदर्द एवं उच्च रक्तचाप कम करने वाली औषधियों मै भी किया जाता है| वैज्ञानिकों ने रीठा से निर्मित गर्भ- निरोधक क्रीम बनाने में सफलता प्राप्त की है| रीठा पर अभी अनुसन्धान जारी है संरक्षण औद्योगिक रूप से अत्यधिक महत्व की प्रजाति होने के पश्चात भी, संरक्षण व उत्पादन हेतु
वृक्षारोपण जैसी योजनाओ के अभाव में, रीठा अब विलुप्ति के कगार पर है| भारत में वर्तमान स्थिति में रीठा के प्रजाति की बड़ी आबादी (meta-population) नहीं है| वैसे तो यह प्रजाति बीज के द्वारा आसानी से उत्पन्न की जा सकती है, पर फल व बीजों के व्यापारिक
महत्व होने के कारण इन्हें परिपक्व होने पर तुरंत ही एकत्रित कर लिया जाता है| ऐसी स्थिति में विभिन्न नर्सरी तकनीकों के माध्यम से अलैंगिग जनन को प्रभावी रूप से लागू किया जा सकता है| निश्चित रूप से प्रजातियों के संरक्षण हेतु, इनकी मौजूदा आनुवंशिक भिन्नता का पता लगा कर, इलीट आबादी व जीनरूपों को प्राकृतिक आवास व संरक्षित क्षेत्र दोनों में ही बनाये रखने की आवश्यकता है| विभिन्न वानिकी योजनाओ के माध्यम से इसके
वृक्षारोपण पर बल दिया जा सकता है| विभिन्न जैव-अनुसन्धान संस्थान इस हेतु प्रयास कर सकते हैं|
निष्कर्ष
वर्तमान में यह देखा गया है की अत्यंत उपयोगी होने के बावजूद रीठा वृक्ष का विस्तार कम होता जा रहा है| आधुनिक युग की चकाचौंध में सामाजिक परिवर्तन से कई वनस्पतियो का भविष्य संकट मै है| इमारती लकड़ी के रूप में प्रयोग न होने के कारण एवं कृत्रिम रसायनों से निर्मित साबुन एवं शैम्पू एक सस्ता विकल्प के रूप में बाजार में मौजूद होने से आम जनमानस रीठा वृक्ष के महत्व को नज़रंदाज़ कर रहे है और इसके संरक्षण के प्रति उदासीन बने हुए है| अतः वन विभाग व विभिन्न गैर सरकारी समूहो को आगे आकर औषधीय एवं औद्योगिक गुणों से महत्यपूर्ण इस वृक्ष के संरक्षण की पहल करना चाहिए| रीठा के वृक्ष को
कृषिवानिकी के रूप में भी विकसित किया जा सकता है अन्यथा आगे आने वाले समय में रीठा की मांग तो होगी लेकिन रीठा उपलब्ध न होगा और आने वाली पीड़ी इस बहुमूल्य वृक्षके लाभ से वन्चित रह जाएगी| 

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